दिल्ली में हुई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय जनता पार्टी के जम्मू-कश्मीर प्रभारी राम माधव ने घोषणा की. बीजेपी महासचिव राम माधव ने समर्थन वापसी के फ़ैसले का ठीकरा महबूबा मुफ़्ती पर फोड़ा. उन्होंने कहा कि महबूबा मुफ़्ती हालात नहीं संभाल पाईं.
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एक दिन पहले ही जम्मू-कश्मीर के अपने नेताओं को दिल्ली बुलाया था. लेकिन किसी को इस बात का इल्म नहीं था कि बीजेपी इतना बड़ा फ़ैसला लेने वाली है. वहीं पीडीपी का भी कहना है कि बीजेपी समर्थन वापसी का फ़ैसला ले लेगी इसका अंदाज़ा नहीं था. महबूबा मुफ्ती भी शायद हैरान रह गई थीं. उन्होंने कहा, “कश्मीर कोई दुश्मन की जगह नहीं है. यह हमारा अपना इलाका है. इसके साथ जोर-जबरदस्ती की नीति नहीं चल सकती.”
2014 में राज्य में जब चुनाव हुए तो नतीजे ऐसे आए कि सरकार बनाने की सूरत बस एक थी, भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी का मिलन. 87 सीटों में से पीडीपी को 28, बीजेपी को 25, नैशनल कॉन्फ्रेंस को 15 और कांग्रेस को 12 सीटें मिली थीं. बाकी सीटें छोटे दलों या निर्दलीयों के पास थीं. यानी बहुमत का आंकड़ा सिर्फ तब पूरा हो रहा था जब पीडीपी और बीजेपी मिल जाएं. दोनों पार्टियां विचार धारा के स्तर पर एकदम उलट खड़ी दिखाई देती हैं इसलिए लोग हैरान रह गए जब दोनों ने मिलकर सरकार बनाने का फैसला किया. बीजेपी को इस फैसले के लिए खासी आलोचना भी झेलनी पड़ी थी. और तब भी बहुत से लोगों को संदेह था कि यह गठजोड़ कार्यकाल पूरा कर पाएगा.
कांग्रेस और नैशनल कान्फ्रेंस ने यह भी साफ कर दिया कि उनके पास बहुमत नहीं है लिहाजा वे सरकार बनाने की कोशिश नहीं करेंगे.
सवाल ये है कि बीजेपी का यह फैसला अब क्यों आया. वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक पराशर कहते हैं कि इसके पीछे सिर्फ एक वजह नहीं हो सकती. वह कहते हैं, “गतिरोध की स्थिति हमेशा से बनी हुई थी. और बेमेल गठबंधन के हालात हमेशा से हैं. तो ऐसा लगता है कि यह अभी सामने आया है. पर ऐसा है नहीं.”
पराशर कहते हैं कि महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर में एक इस्लामिक संस्था अहल-ए-हदीस को जमीन दी थी जिससे बीजेपी नाराज थी. वह कहते हैं, “कई सारी चीजें जमा हो गई थीं लेकिन अहल-ए-हदीस को जमीन देने के फैसले पर बीजेपी को ऐसा लगा कि इससे जम्मू का उसका अपना वोटबैंक भी खिसक सकता है, लिहाजा बीजेपी ने यह फैसला किया.”




