भारत में कीचड़ में कमल और गूदड़ी में लाल जैसी कहावतें इसलिए इतनी चर्चित हैं क्योंकि वे एकदम सच हैं. अभावग्रस्त हालात से निकलकर जिंदगी की ऊंचाइयों को छूने की हजारों कहानियां हैं. लेकिन ऐसी लाखों कहानियां दबी छुपी अनकही रह जाती हैं. जैसे मेनसा का अनुमान है कि भारत में 50 लाख बच्चे ऐसे हैं जिनका आईक्यू जीनियस लेवल का है. यानी वे दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली लोगों जितने ही बुद्धिमान हैं.

मसलन मुंबई की झुग्गी बस्ती में रहने वाली रितु पासवान का आईक्यू है 145. महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन का आईक्यू भी 145 था. अपोलो मिशन पर जो अंतरिक्ष यात्री गये थे उनका औसत आईक्यू 136 है. हिलेरी क्लिंटन का आईक्यू भी 140 है. मेन्सा के मुताबिक भारत में ऐसे ही बुद्धिमान बच्चों की संख्या 50 लाख से ऊपर है. इनमें से ज्यादातर झुग्गी बस्तियों में हैं. 165 आईक्यू वाले मेन्सा के स्कोलर किशोर अस्थाना कहते हैं, हम ऐसे अनघड़ हीरे खोजने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उन्हें चमका सकें. जो लोग चुने जाएंगे उनकी जिंदगी बदल जाएगी.
मेन्सा ने ही रित पासवान को खोजा है जो डॉक्टर बनना चाहती हैं. बेहद गरीबी में पल रहीं रितु कहती हैं, मुझे डॉक्टर बनना है और मुझे शत प्रतिशत विश्वास है कि मैं डॉक्टर बन जाऊंगी.

रितु जैसे ही हालात में रहने वाली वर्षा कुमारी की मां तो इतना भी नहीं कमा पातीं कि सबका पेट भर सकें. उनके पिता शराब की लत के शिकार हैं. इसलिए वर्षा के लिए जिंदगी आसान नहीं है लेकिन मुश्किल उसे सपने देखने से नहीं रोक पा रही हैं. उसका सपना है आसमान की सैर. वह अंतरिक्ष यात्री बनना चाहती हैं. 14 साल की वर्षा का आईक्यू 135 है. चांद पर उतरने वाले इंसान नील आर्मस्ट्रॉन्ग का आईक्यू भी इतना ही था.
एक साल से चल रहे मेन्सा के इस कार्यक्रम में बच्चों को एक टेस्ट से गुजरना होता है. इस टेस्ट में 98 फीसदी अंक हासिल करने वाले बच्चों को विशेष स्कॉलरशिप के तहत सबसे अच्छे स्कूलों में दाखिला मिलता है.

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