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बँटवारे की आँखों देखी कहानी कुछ लोगों की ज़बानी

Partition of India - Crowded Train
In this September 1947, file photo hundreds of Muslim refugees crowd on top a train leaving New Delhi for Pakistan. Source: AP

70 साल पहले 14 अगस्त के दिन एक लकीर खींच कर भारत और पाकिस्तान नाम के दो मुल्क बना दिए गए. इस बंटवारे की असली कहानियां...


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By Kumud Merani

Source: SBS



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70 साल पहले 14 अगस्त के दिन एक लकीर खींच कर भारत और पाकिस्तान नाम के दो मुल्क बना दिए गए. इस बंटवारे की असली कहानियां...


सुभाषिनी चानना भारतीय, ऑस्ट्रेलियन इंडियन हिंदी असोसिएशन

बंटवारे के वक्त हमारे घर के आसपास बहुत से मुस्लिम परिवार रहते थे. हम बच्चे साथ खेलते थे. अचानक एक दिन हमारा घर के बाहर जाना ही बंद हो गया. हम तो बच्चे थे, हमें समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है. और नीचे हमने खिड़की के बाहर झांककर देखा तो वहां ट्रक खड़े थे, लाशों से भरे हुए. हमने देखा कि वे लोगों की लाशें फेंक रहे हैं ट्रकों में. रात के वक्त में छतों पर जाते थे. हम कनॉट प्लेस में रहते थे तो वहां से हमें पहाड़गंज के जलते घर दिखते थे. सबसे बुरा मुझे लगा कि हमारे दोस्त बिछड़ गए. काफी साल बाद मेरे बड़े भाई के एक दोस्त पाकिस्तान से मिलने आए.

Indian Policemen
Three wounded Indian policemen receiving treatment following the riots in Lahore, when Sikhs, Hindus and Muslims clashed. Source: Keystone/Getty Images

जावेद नजर पाकिस्तानी

मेरे माता-पिता का ताल्लुक यूपी से रहा. मेरे वालिद भारत-पाक के बड़े शायर रहे. वह रेलवे में काम करते थे. वह प्लेन से लाहौर आ गए. मेरी मां और दो भाई दिल्ली से ट्रेन से आए थे. वह बताती थीं कि पश्चिमी पंजाब यानी जो हिंदुस्तानी पंजाब से गुजरे थे. और मेरे वालिद साहब उस वक्त लाहौर में थे. उन्हें तब बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि मेरी मां बची होगी. जब वह स्टेशन पर पहुंचे तो अजीब समां था. भूखे. किसी के जिस्म पर कपड़े नहीं. जूते नहीं. और स्थानीय लोग उन्हें परांठों पर गुड़ रखकर खिला रहे थे. तब मेरे वालिद साहब की नजर पड़ी मेरी अम्मी पर.

लकीरें हैं

तो रहने दो

किसी ने गुस्से में वो खींच दी थीं.

उन्हीं को अब बनाएं पाला

और आओ कबड्डी खेलते हैं

मेरे पाले में तुम आओ

मुझे ललकारो, भागो

तुम्हें पकड़ूं, लपेटूं, टांग खेंचूं

और तुम्हें वापस ना जाने दूं

और तुम्हारे पाले में जब कौडी कौडी करता जाऊं मैं,

मुझे तुम भी पकड़ लोगे,

मुझे छूने नहीं दोगे

वो सरहद की लकीरें जो गुस्से में खेंच दी थीं किसी ने

उन्हीं को अब पाला बनाएं

और आओ कबड्डी खेलते हैं

लकीरें हैं

तो रहने दो

Soldiers and Crowd Piled on Top of Car
(Original Caption) 9/5/47-India- Armed soldiers join Moslem refugees as they crowd one of the very few modern vehicles. Source: Getty Images/Bettmann

जुबिन मरौलिया

पारसी

हम पारसियों पर तो ज्यादती नहीं हुई लेकिन आसपास सुना कि कितना जुल्म हुआ. मेरी मां बताती थीं कि हमारे घर के पीछे लोगों को कैसे मारा गया. लोगों का एक पांव खंभे से बांध देते थे और दूसरा पांव जीप से बांधकर खींचते थे. उसे दो टुकड़ों में बांट देते थे. 50 साल बाद भी ये कहानियां सुनते हुए हमारी मां कांपने लगती थीं.

Indian Refugees Piling on Trains
Indian refugees crowd onto to trains as a result of the creation of two independent states, India and Pakistan. Source: Getty Image/Bettmann

'बंटवारे के वो दृश्य जो भुलाये नहीं भूलते'

बलवंत चड्ढा (भारतीय) सिख

बंटवारे के वक्त मेरे पिता तो केन्या में थे. हम वहां से निकले तो आर्मी ने ट्रेन में बिठा दिया. वो आखिरी ट्रेन थी लाहौर से जो जा रही थी. दो दिन तक वहीं फिरते रहे. दूध नहीं था और इस कारण मेरी बहन चल बसी. फिर ट्रेन चली और भारत पहुंची. हमें उस ट्रेन से सोनीपत या पानीपत में उतार दिया गया. वहां मेरी मां ने अपने कुछ गहने बेचे और एक घर किराये पर लिया. वो घर किसी ऐसे का था जो पाकिस्तान चला गया था. वहां हम रहे. लेकिन हमारे पिता से कोई संपर्क ही नहीं हुआ. मेरे पिता चार महीने तक हमें खोजते रहे. वो हर उस जगह गए जहां लाहौर से आने वाली आखरी ट्रेन रुकी थी. तो जब वो पानीपत पहुंचे, वहां एक खेलते बच्चे से पूछा कि बिल्लू को जानते हो. उस बच्चे ने कहा कि हां बिल्लू तो हमारे साथ खेलता है. इस तरह हम हमारे पिता से मिल पाए.

Golden Temple After Riots
A view towards the Golden Temple (Sri Harmandir Sahib), the holiest shrine of Sikhism, after communal riots in Amritsar, Punjab. Source: Keystone Features/Hulton Archive/Getty Images

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