खास बातें
- अध्ययन से पता चलता है कि आस्ट्रेलियाई लोग संदिग्ध लेख साझा करने के मामले में दुनिया में सबसे खराब लोगों में से हैं।
- प्रौद्योगिकी प्रगति ने झूठी खबरों को ऑनलाइन पर वास्तविक दिखाना आसान बना दिया है।
- झूठी खबरें मानव व्यवहार पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती हैं जब यह पहले से मौजूद मान्यताओं या संदेह की पुष्टि करती है।
हमारे डिजिटल युग में गलत सूचना एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है।
आरएमआईटी विश्वविद्यालय में स्थित एक तथ्य-जाँच इकाई, आरएमआईटी फैक्ट लैब की एसोसिएट निदेशक सुशी दास के अनुसार, गलत सूचना का तात्पर्य उस गलत जानकारी से है जिसे लोग यह जाने बिना साझा करते हैं कि यह गलत है।
दूसरी ओर, दुष्प्रचार झूठी सूचना है जिसे लोग जानबूझकर दूसरों को धोखा देने के लिए बनाते हैं। ऐसा विभिन्न कारणों से किया जा सकता है, जैसे मज़ाक के लिए, राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देना, या क्लिक के माध्यम से पैसा कमाना।
सुशी दास और उनकी टीम जैसे तथ्य-जाँचकर्ता, उन पोस्टों की पहचान करने के लिए सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री की समीक्षा करते हैं जिनमें गलत सूचना या दुष्प्रचार हो सकता है।
फिर वे सामग्री की सटीकता को सत्यापित करने के लिए गहन शोध करते हैं। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि सटीक जानकारी जनता के साथ साझा हो।
सुश्री दास ऑस्ट्रेलिया में गलत सूचना और दुष्प्रचार के मिश्रित मिश्रण की पहचान करती हैं। वह कहती हैं कि मौजूदा समाचारों की सुर्खियां अक्सर सोशल मीडिया पर गलत सूचनाएं फैलाती हैं।
सुश्री दास कहती हैं, "उदाहरण के लिए, इस समय, रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है। इसलिए, उस युद्ध के बारे में गलत सूचना और दुष्प्रचार है। मध्य पूर्व में एक और युद्ध है। फिलिस्तीन और इज़राइल की स्थिति है, उसके आसपास भी बहुत सारी गलत सूचनाएं और दुष्प्रचार हैं। हम नियमित रूप से वित्तीय घोटाले और स्वास्थ्य संबंधी गलत सूचनाएं भी देख रहे हैं।''

सोशल मीडिया का प्रभाव
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक महत्वपूर्ण विज्ञापन उपकरण के रूप में काम करते हैं। इनका व्यापक रूप से संचार और विचारों के आदान-प्रदान के लिए उपयोग किया जाता है और उपयोगकर्ता को उनकी प्राथमिकताओं और गतिविधियों के आधार पर अनुकूलित करने के लिए सामग्री का उपयोग किया जाता है, जिससे जुड़ाव और प्रासंगिकता बढ़ती है।
हालाँकि, क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी the Queensland University of Technology, में डिजिटल मीडिया के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. टिमोथी ग्रहम बताते हैं कि कैसे ये एल्गोरिदम अनजाने में झूठी खबरें और गलत सूचना फैला सकते हैं।
डॉ. ग्रहम कहते हैं, "लोगों की फ़ीड में ऐसी सामग्री आएगी जिसको वह टाल नहीं पाते है। मनुष्य, वास्तव में भावनात्मक मीडिया-समृद्ध सामग्री के लिए सामाजिक और भावनात्मक रूप से जुड़ता हैं, जो जरूरी नहीं कि तथ्यात्मक हो।"
वह कहते हैं कि सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म सामग्री को बढ़ाते और बढ़ावा देते हैं, जिससे उपयोगकर्ताओं की मजबूत प्रतिक्रियाएँ होती हैं। लोग ऐसी सामग्री साझा करते हैं जो एक मजबूत भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करती है, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक।
गलत सूचना विभिन्न स्रोतों से आ सकती है, जैसे वास्तविक गलतियाँ, पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग, सनसनीखेज, और जानबूझकर राजनीतिक, वैचारिक या आर्थिक हेरफेर।
षड्यंत्रतों में अक्सर गुप्त साजिशों के बारे में जटिल कहानियाँ शामिल होती हैं। इसके विपरीत, गलत सूचना में झूठी या भ्रामक जानकारी की एक विस्तृत श्रृंखला होती है जिसमें षड्यंत्रकारी तत्व शामिल हो भी सकते हैं और नहीं भी।
आरएमआईटी फैक्ट लैब टीम द्वारा जांच की गई साजिश का एक उदाहरण कपड़ों में टैग की जगह क्यूआर कोड के बारे में था।
दावा किया गया कि फैशन उद्योग को अधिक टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से यह पहल विश्व आर्थिक मंच, बैंकों और सरकार द्वारा लोगों को ट्रैक करने और नियंत्रित करने की एक चाल थी।
"यह गलत है। यह बिल्कुल गलत है। ये कोड आपको वस्तु के बारे में विवरण बताते हैं, कि इसे कहां बनाया गया था, क्या इसे नैतिक रूप से बनाया गया था, धोने के निर्देश और उस कपड़े का विवरण। लेकिन, निश्चित रूप से, ऐसे लोग हैं जो तर्क दे रहे हैं कि इससे आप पर नज़र रखी जा रही है," सुश्री दास कहती हैं।

गलत सूचना का प्रभाव
सिडनी स्थित बिहेवियर वैज्ञानिक डॉ. डेरेन कोपिन का कहना है कि भाषा की शुरुआत से ही गलत सूचनाएं मौजूद रही हैं।
और अब यह महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव वाला एक अधिक प्रचलित मुद्दा है।
अतीत में, लोगों को अपने तथ्य, सच्चाई और विश्वास अपने स्थानीय समुदाय, परिवार और संस्कृति से मिलते थे। आजकल, हमें दुनिया भर और विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त होती है।
"कैनबरा विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, University of Canberra study, आस्ट्रेलियाई लोग फर्जी लेख साझा करने के मामले में दुनिया में सबसे खराब लोगों में से हैं। 80 प्रतिशत ऐसे लेख साझा करेंगे जिन्हें वे भी संदिग्ध मानते हैं। तो यह स्पष्ट रूप से उस मुद्दे को जटिल बना रहा है जिसका हम सामना कर रहे हैं - फेक समाचार और गलत सूचना,'' डॉ. कोपिन कहते हैं।
वह बताते हैं, गलत सूचना या झूठी खबरें पहले से मौजूद मान्यताओं या संदेह की पुष्टि करके मानव व्यवहार पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती हैं। यह प्रभाव मतदान तक फैल सकता है, जहां सार्वजनिक नीति झूठी खबरों से प्रभावित दृष्टिकोण को दर्शाती है, और राजनेता जनता से अपील करने का प्रयास करते हैं।
डॉ. कोपिन याद करते हैं, "विशेष रूप से कोविड के दौरान, हमने कोविड के हर पहलू पर गलत सूचना के साथ कई मुद्दे देखे। और विश्व स्वास्थ्य संगठन World Health Organization के महानिदेशक ने कहा कि हम सिर्फ एक महामारी से नहीं लड़ रहे हैं - हम एक सूचना महामारी से लड़ रहे हैं।" .
डॉ. कोपिन निम्नलिखित कारणों की भी पहचान करते हैं जिनके कारण मनुष्य जानबूझकर या अनजाने में झूठी खबरें फैला सकते हैं।
फर्जी खबरें, मनुष्य की अनिश्चितता के प्रति घृणा पर खेलती हैं। हम पूरी तरह से सुरक्षा और नियंत्रण की भावना चाहते हैं। हम उस अनिश्चितता को मिटाने के लिए प्रेरित रहते हैं। तो, हम उत्तर खोजते हैं। और यदि वे आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, तो हम ही उसमें कमियां भर देते हैं। इसलिए, हम ऐसी किसी भी जानकारी के शौकीन हैं जहां कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है।Behavioural Scientist, Dr Darren Coppin
उनके अनुसार, मनुष्य का नकारात्मक दृष्टिकोण, हमारे अन्दर गहराई से समाया हुआ है। हमारी जीवित रहने की प्रवृत्ति हमें स्वाभाविक रूप से निराशावाद की ओर झुकाती है - किसी भी खतरे से सावधान रहने वालों के लिये किसी भी शत्रुतापूर्ण वातावरण में जीवित रहने की अधिक संभावना होती है।
डॉ. कोपिन कहते हैं, "यदि आप कभी किसी ऑस्ट्रेलियाई से बात करते हैं और आप पहले विदेश में रहे हैं, तो वे अक्सर विदेशियों के साथ यहां की सुंदरता और अवसर के बजाय - मकड़ियों, सांपों और शार्क के बारे में बात करते हैं, जो यहां ऑस्ट्रेलिया में प्रचुर मात्रा में हैं।"
झूठी खबरें या गलत सूचना फैलाने का दूसरा कारण हमारा "एक तरफा - पुष्टिकरण पूर्वाग्रह" है।
डॉ. कोपिन के अनुसार, यदि हम ऐसे समूह से संबंधित हैं जो टीकाकरण का विरोध करता है, तो हम ऐसी जानकारी की खोज करते हैं जो हमारी मान्यताओं के अनुरूप हो, और वही हमें याद रहती है।
उनका कहना है कि हमें ऐसी जानकारी याद रखने की अधिक संभावना है जो हमारी पहले से मौजूद मान्यताओं की पुष्टि करती है, जो आगे ध्रुवीकरण और अतिवाद की ओर ले जाती है।
डॉ. कोपिन यह भी बताते हैं कि प्रौद्योगिकी की प्रगति, जिसने ऑनलाइन पर झूठी खबरों को वास्तविक दिखाना आसान बना दिया है, गलत सूचना के तेजी से फैलने का एक अन्य कारण है।
डॉ. कोपिन और विस्तृत तरह से अपनी बात को कहते हैं, "जब आप किसी के साथ आमने-सामने होते हैं, तो आप उनकी चालाकी या उनके अजीब व्यवहार या पसीने से तर हथेलियों से पता लगा सकते हैं; यह हमें सूचित कर सकता है कि वे अविश्वसनीय हैं या वे जो कह रहे हैं उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता है।"

फर्जी खबरों की पहचान करना और उनका विरोध करना
आज की दुनिया में गलत सूचनाओं के प्रसार को देखते हुए, सच और झूठ के बीच अंतर करना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
समाचारों को पहचानने और सत्यापित करने का कौशल विकसित करना महत्वपूर्ण है।
सुशी दास वास्तविक समाचारों को झूठी समाचारों से अलग करने के लिए अपनी प्रमुख रणनीति को साझा करती हैं।
"आप बस कुछ कीवर्ड (मुख्य शब्द) ले सकते हैं, एक नया टैब खोल सकते हैं, उन कीवर्ड को एक नए टैब में डाल सकते हैं, और खोज सकते हैं कि उन कीवर्ड का उपयोग करके आप और क्या अन्य चीजें पा सकते हैं। आप यह देखने के लिए उस शब्द के तथ्य की जांच के साथ कुछ कीवर्ड भी डाल सकते हैं कि क्या कोई उस विषय के बारे में पहले ही एक लेख या तथ्य जांच लेख लिख चुका है।"
सुश्री दास यह भी सुझाव देती हैं कि यदि आप कोई तस्वीर देख रहे हैं और सोच रहे हैं कि क्या यह सही या वास्तविक है, तो आप गुगल (Google ) पर छवि को खोजने का विकल्प पाने के लिए उसपर राइट-क्लिक कर सकते हैं।
वह यह भी कहती हैं कि झूठी सूचना के प्रसार से निपटने का एक प्रभावी तरीका उचित संवाद करना, अपमान करने से बचना और समय के साथ लगातार तथ्यात्मक जानकारी प्रस्तुत करना है।
यह समझना आवश्यक है कि परिवर्तन एक क्रमिक प्रक्रिया है जिसके लिए धैर्य की आवश्यकता होती है।
डॉ. कोपिन संदिग्ध समाचार या जानकारी को ऑनलाइन साझा करने से पहले सावधानी बरतने का भी सुझाव देती हैं।
"रुको और सोचो, क्या मैं इसे दोहराऊं, या क्या मैं इसे सार्वजनिक रूप से किसी के लिये कहूं? और यदि आप निश्चित नहीं हैं, तो कृपया चीजों को फारवर्ड और साझा न करें क्योंकि आप एक गलत सूचना के प्रभाव को और बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। और दूसरी बात, अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों से सावधान रहें।"

भविष्य के रुझान
जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी आगे बढ़ती है, गलत सूचना का प्रसार भी बढ़ता जाता है।
प्रोफेसर टिमोथी ग्रहम बताते हैं कि इस बदलती डिजिटल दुनिया में हमें भविष्य में किन चुनौतियों का अनुमान लगाना चाहिए।
उनका कहना है कि जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि यह ऐसी सामग्री बना सकता है जो किसी इंसान द्वारा लिखी गई प्रतीत होती है और पहली नज़र में अत्यधिक विश्वसनीय होती है।
डॉ. ग्राहम कहते हैं, "यह केवल टेक्स्ट ही नहीं है, बल्कि, जाहिर है, छवियां भी हैं। एक वास्तविक चुनौती यह हुई है कि हमारे पास एआई-जनित सामग्री की बाढ़ आ गई है, यानी यह मिश्रित हो रही है, और यह अधिक से अधिक जटिल होता जा रहा है कि इसमें से क्या एक तथ्यात्मक छवि या एक प्रामाणिक है और क्या नहीं है। "










