आलीशान इमारतें, महल और मकबरे बनवा कर बहुत से राजा, महाराजा औक नवाब अमर हो गए. आज भी उनकी बनवाई हुई इमारते मौजूद हैं, लोग उन्हें देखने जाते हैं और तारीफ करते हैं. लेकिन कभी कभी कुछ इमारतें अधूरी रह कर भी अमर हो जाती हैं. तब भी लोग उन्हें देखते हैं और यही सोचते हैं कि काश ये पूरी बन जाती तो कितनी भव्य होती.
भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले सूबे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक ऐसी ही ईमारत मौजूद है, जो आज तक 177 साल से पूरी नहीं हुई, लेकिन अपने साथ बहुत कहानियां समेटे है. बात हो रही है पुराने लखनऊ में स्थित सतखंडा की. वैसे सतखंडा तो सिर्फ वॉच टावर माना जाता है लेकिन जाने किस मकसद से सतखंडा को अवध के तीसरे नवाब मोहम्मद अली शाह ने 1837 में बनवाना शुरू किया. क्यों बनवाना चाहते थे, लोग बहुत कुछ बताते हैं. एक लाल ईंटों वाला सात मंजिला आसमान छूने वाला बुर्ज़, जिसके ऊपर से अपनी सल्तनत देखने, पतंगबाज़ी के लिए, अज़ान देने के लिए, संतरियों के पहरा देने के लिए, कबूतरबाज़ी के लिए या अपनी पत्नी के लिए कि उसके ऊपर से सबसे पहले ईद का चांद देख लें या फिर अपनी बेटी की याद में. असली वजह आज तक नहीं पता.
लोग यहां तक कहते हैं कि सतखंडा को असलियत में नौखंडा बनवाने का इरादा था ताकि वो दुनिया का आठवां अजूबा हो जाए और बेबीलोन के टावर से भी ऊंचा. नवाब साहब की हसरत अधूरी रह गई लेकिन सतखंडा आज भी बुलंदी से खड़ा है, अधूरा ही सही. जैसा नाम से लगता है कि इसमें सात मंजिलें होंगी वैसा नहीं है. इस अधूरी ईमारत में सिर्फ चार तल हैं.
कहते हैं कि नवाब इसके बनने के दौरान भी इसको देखने आये थे लेकिन उनका पैर जीने पर लचक गया और फिर इसको अधूरा छोड़ दिया. वैसे भी अवध में लोग ये मानते रहे हैं कि किसी भी इमारत को बनवाने वाला अगर बीच में मर जाता है तो उसको अशुभ मान लिया जाता है.
वैसे इसको देख कर कुछ लोग इटली के लीनिंग टावर ऑफ़ पीसा से तुलना शुरू करते हैं, शायद उसी तरह इसके पास भी एक तालाब बना हुआ है. पास में ही भारत का सबसे ऊंचा क्लॉक टावर भी बना हुआ है. लेकिन ये इमारत अपने आप में अलग है.
सतखंडा में हर तल अपने से नीचे वाले से छोटा है. हर तल की नींव नीचे से गई हुई है. इस वजह से इसमें भूलभुलैय्या जैसी घुमावदार गली बनी हुई है. गोलाकार का सीढ़ियां आपको ऊपर तक ले जाती हैं. मेहराबदार दर इस्लामिक शैली में है तो बड़ी बड़ी खिड़कियां यूरोपियन शैली में. इस डिजाइन को बनाया था राजा बख्तावर सिंह ने. पहला तल बीस फीट ऊंचा है फिर हर तल दो फीट कम है. पहले तल पर बीस दरवाज़े हैं जो ऊपर जा कर 24 हो गए हैं. हां उनका आकार घटता गया.
नवाब मोहम्मद अली शाह के बाद सतखंडा के भी बुरे दिन शुरू हो गए थे. अंग्रेजों के शासन में किसी ने इसको ध्यान नहीं दिया. फिर पहली बार 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसकी मरम्मत करायी और आसपास के लॉन को ठीक कराया, लाइटिंग करवाई. सतखंडा फिर से चमकने लगा. आज भी अधूरे होने के बाद भी ये लखनऊ के हेरिटेज जोन में अलग नज़र आता है.



