भारत से फिजी के गन्ने के खेतों तक अपने पूर्वजों की यात्रा को याद करते हुए इंडो-फिजियन समुदाय आज भी उस इतिहास के प्रभावों पर विचार करता है। उनके 60 हज़ार से अधिक वंशज अब ऑस्ट्रेलिया को अपना घर कहते हैं, लेकिन पनी पहचान और विरासत से जुड़े सवालों से जूझ रहे लोगों के अनुभवों में उस पीड़ादायक दौर की गूंज आज भी सुनाई देती है।
1879 से शुरू होकर अगले चार दशकों के दौरान 60 हज़ार से अधिक भारतीयों को गिरमिट या अनुबंधित श्रम व्यवस्था के तहत ब्रिटिश उपनिवेश फिजी ले जाया गया।
वहां उन्हें गन्ने के खेतों और शक़्कर मिलों में बेहद कठिन, श्रमसाध्य और अक्सर अमानवीय परिस्थितियों में काम करना पड़ा।
अगर आप देर से उठते थे... तो आपको कोड़े पड़ते थे।हौसिलदारन, पूर्व बंधुआ मज़दूर
आज भी उस दौर के भावनात्मक और सामाजिक आघात का असर उनके कई वंशजों के जीवन में महसूस किया जा रहा है।
आवर पैसिफ़िक के इस अंक में हम फिजी में भारत से आए गिरमिटिया या अनुबंधित श्रमिकों के आगमन और उनकी विरासत की पड़ताल करेंगे।
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