एबोरिजिनल और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर लोगों ने मौखिक कथाकाहन संस्कृति को जागृत रखते हुए, कला के ज़रिये अपनी सांस्कृतिक कथाओं, आध्यात्मिक विश्वासों, और भूमि के गूढ़ ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी ज़िंदा रखा है।
मुख्य बिंदु:
- प्रथम राष्ट्र कला केवल डॉट पेंटिंग तक ही सीमित नहीं है।
- कला के ज़रिये सांस्कृतिक कथाओं, आध्यात्मिक विश्वासों, और भूमि के गूढ़ ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी ज़िंदा रखा गया है।
- इन कलाकृतियों से कलाकार अपने राष्ट्र के निकट महसूस करते हैं।
- अलग-अलग कला प्रतीकों का अर्थ कलाकार अपने अनुसार गढ़ते हैं।
प्रथम राष्ट्र कला दुनिया की सबसे पुरानी कला-संस्कृतियों में से एक है जिसका अपना एक समृद्ध इतिहास है। सबसे पुरानी रॉक पेंटिंग 17,500 साल पुरानी बताई गयी है।
एबोरिजिनल और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर लोगों के लिए यह कला अपनी सांस्कृतिक कथाओं, आध्यात्मिक विश्वासों, और भूमि के गूढ़ ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी ज़िंदा रखने का एक अहम माध्यम रही है।
प्रथम राष्ट्र कला का विस्तार वृहद है जिसमें कई प्रकार की तकनीक और शैलियां प्रयोग की जाती हैं। हर कला शैली और तकनीक अलग-अलग राष्ट्रों, समुदायों, और सांस्कृत्यों की परिचायक हैं।
हालाँकि कुरी महिला और विरायुरि लोगों की 'स्वच्छ जल' महिला मारिया वॉटसन-ट्रजेट समझाती हैं कि एबोरिजिनल कला को लेकर लोगों में कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं।
सुश्री वॉटसन-ट्रजेट एक प्रथम राष्ट्र सलाहकार हैं, और स्वयंप्रशिक्षित कलाकार हैं, जो अपनी एबोरिजिनल संस्कृति को लोगों के साथ साझा करने के लिए उत्सुक रहती हैं।
"कुछ लोगों का मानना है कि डॉट पेंटिंग ही एबोरिजिनल कला का सच्चा और पारम्परिक रूप है। ऐसा बिलकुल नहीं है, बल्कि यह भ्रामक सोच है।
"हमारी पारम्परिक कला में औज़ारों पर पहचान बनाने वाले चिन्ह गढ़ना, अपने सांस्कृतिक अनुष्ठानों और अंतिम संस्कार स्थलों की पहचान के लिए पेड़ों में नक्काशी, या अनुष्ठानों के लिए शरीर पर बनाई जाने वाली कलाकारी प्रमुख रहे। ज़रूरी नहीं था कि यही कला हो," वे समझाती हैं।
सुश्री वॉटसन-ट्रजेट समझाती हैं कि डॉट पेंटिंग का विकास तो '70 के दशक में ऐलिस स्प्रिंग्स के उत्तर-पश्चिम में पापुण्या के एक छोटे एबोरिजिनल समुदाय में हुए वेस्टर्न डेज़र्ट आर्ट मूवमेंट से हुआ। यहीं से कलाकारों ने अपनी पारम्परिक कहानियों को लकड़ी की तख्तियों पर एक्रिलिक रंगों से उकेरना शुरू किया।
एबोरिजिनल कलाकार अपनी कहानियों और संस्कृतियों को विविध शैलों की एबोरिजिनल कला से व्यक्त करते हैं। ऐसा हर कुछ जो एक एबोरिजिनल व्यक्ति स्वयं को अपने राष्ट्र और संस्कृति से जोड़ने के लिए पेंट करते हैं, जो [उन्हें] अपनत्व का एहसास करता है, वह एबोरिजिनल कला है।मरिया वॉटसन-ट्रजेट
संस्कृति का साझा किया जाना
सुश्री वॉटसन-ट्रजेट ने वर्ष 2009 में यूनिवर्सिटी की फुल-टाइम पढ़ाई के तनाव को कम करने के लिए चित्रकारी शुरू की थी। उन्हें जल्द ही समझ आ गया था कि यह कला 'मन को शांत' करने के माध्यम भर से कहीं ज़्यादा है।
यह मेरी कहानी को दूसरों के साथ साझा करने के बारे में है, [और] साथ ही मेरी संस्कृति को ज़िंदा रखने के बारे में भी। यह मुझे मेरी एबोरिजिनल संस्कृति, मेरे राष्ट्र, मेरे पूर्वजों, मेरे लोगों और उस ज्ञान से जोड़े रखता है जो परिवार के साथ बड़े होते हुए मैंने अपने राष्ट्र में सीखा।मारिया वॉटसन-ट्रजेट
आर्केरिया रोज़ आर्मस्ट्रांग एक गामिलराय/बिगामल और योरटा योरटा कलाकार हैं। वे अपने कलाकार दादा-दादी की कहानियों को सानुराग स्मरण करती हैं।
उनकी दादी एक गामिलाराय पूर्वज हैं और इलाके की आख़िरी रेत चित्रकारों में से एक थीं।
"वे हमें अपनी कहानियां ज़मीन पर बैठ कर सुनाती थीं, राष्ट्र की भूमि पर, रेत के राष्ट्र में, रेत की कहानियां सुनाती थीं मेरी दादी," सुश्री आर्मस्ट्रांग याद करती हैं।
यह कहानियां पीढ़ियों से चली आ रही थाती हैं। इनमें उत्पत्ति की कहानियां है, सितारे हैं , जानवर हैं, और उनकी दादी के राष्ट्र में बड़े होने के अपने अनुभव हैं। वे बताती हैं कि हर कहानी में अपनी एक अलग सीख है।

"वे अपनी जीवनयात्रा और अपनी कहानियों को अपनी कला से व्यक्त करती थीं। बहुत सारे ऐसे प्रतीक और चित्रण जो वे हमें सुनाया करती थीं, उनकी कला के ज़रिये ही आगये साझा हुए।"
सुश्री आर्मस्ट्रांग अपनी कला को 'दो राष्ट्रों के एकमेक' होने की स्थली बताती हैं।
वे अपनी दादी के प्रतीकों और चित्रणों से प्रेरणा लेकर अपने दादा की तकनीक का प्रयोग करती हैं। उनके दादा भी एक कलाकार हैं।
अपनी कलाकृति से अपनी कहानियों को अपने तरीके से कहने की प्रक्रिया में सुश्री आर्मस्ट्रांग इन कहानियों से अपने रिश्ते के बारे में विचार करती हैं, भावों के एक सैलाब से गुज़रती हैं— और इन एहसासों को अपनी बेटी के साथ भी साझा करती हैं।
संस्कृति को जिलाये रखने के लिए आपको उसे साझा आपको उसे साझा होता है, संस्कृति को रोज़ जीना होता है। आने वाली पीढ़ी के साथ इसे साझा करने का अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि वे हमेशा इस पर चर्चा करते रहेंगे, आगे बात होती रहेगी।आर्केरिया रोज़ आर्मस्ट्रांग
संस्कृति से नाता
दविंदर हार्ट कलाकार हैं जिनकी पारिवारिक जड़ें वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के नूंगा राष्ट्र के दक्षिण-पश्चिम इलाके से जुड़ी हैं। उनके बचपन का एक बड़ा हिस्सा एडिलेड में बीता। इसके बाद उन्होंने न्यू साउथ वेल्स के निम्बा राष्ट्र में अपनी सांस्कृतिक जड़ों के साथ अपना नाता फिर जोड़ा।
श्री हार्ट ने अपने जीवन के शुरूआती वर्षों में बड़ी चुनौतियों का सामना किया। 16 साल की आयु में स्कूल छोड़ने के बाद उन्हें बेरोज़गारी और नशे की लत से जूझना पड़ा।
लेकिन उनके भाइयों और काकाओं के सतत समर्थन के सहारे वे अपनी ज़िन्दगी में सुधार कर सके और अपनी संस्कृति से पुनः जुड़ सके। उनकी कला में उनके जीवन का यह अनुभव झलकता भी है।
"मैं खुशकिस्मत था कि मैं अपने भाइयों और काकाओं से मिल सका, जिन्होंने मुझे हमारे राष्ट्र की कहानियां सिखायीं, और उन कहानियों में [सिखाया कि] अपने आपको एक... सकारात्मक ऊर्जा में कैसे रखना है," वे बताते हैं।
श्री हार्ट के लिए अपनी संस्कृति से जुड़े रहने के लिए कला ही एक माध्यम नहीं है, लेकिन कला मरहम ज़रूर है, दवा है।
"पेंटिग करते समय मैं मन से शांत रहता हूं। मैं उस पूरे दौरान चिंतन में रहता हूं, कला का मनोभाव मुझ पर हावी रहता है, और सच पूछें तो वह कला खुद को खुद ही जागृत करती है। यह अपने आप में किसी चिकित्सा से कम नहीं," वे समझाते हैं।

कला की साझी थाती
सुश्री वॉटसन-ट्रजेट समझाती हैं कि प्रथम राष्ट्र कलाकार विविध प्रकार के चिन्हों का प्रयोग करते हैं, जिनमें से कुछ उनके अपने राष्ट्र से ख़ास सम्बंधित हो सकते हैं, उदाहरण के तौर पर जानवरों के चलने के रास्ते।
उनकी कला में लचीली रेखाओं और एबोरिजिनल चिन्हों के प्रयोग उनके पूर्वजों की उस कलात्मक अभिव्यक्ति की गूँज है जो वे धरा पर चिन्हों और गोदनों के रूप में उकेरते थे।
जहां कुछ चिन्ह सार्वभौमिक हो सकते हैं, कुछ के अर्थ कलकार-विशेष भी हो सकते हैं।
"चिन्हों के अर्थ उनको बनाने वाले कलाकारों पर निर्भर करते हैं। ऐसा कभी नहीं मानना चाहिए कि एक कलाकार द्वारा प्रयोग किया गया चिन्ह दूसरे कलाकार की कला में भी वही मायने रखेगा," वे कहती हैं।
सुश्री आर्मस्ट्रांग कहती हैं कि समझने की शुरुआत करने के लिए कलाकृति में दर्शायी गयी कहानियों को समझा एक बढ़िया स्थान है।
"प्रथम राष्ट्र व्यक्ति कौन हैं? ये कौन से राष्ट्र हैं, कैसे दिखते हैं? आप जब ऐसे सवाल पूछने लगते हैं तो आप कला में छुपे कलकार को भी देखने और महसूस करने लगते हैं," वे कहती हैं।
"कला प्रदर्शनियों में खुद वहां उपस्थित रहकर अपनी कला के बारे में संवाद करना, लोगों के साथ उस कलाकृति के धागे जोड़ना कला साझा करने के मेरे पसंदीदा तरीकों में से एक है,
"मुझे लगता है कि कई बार कला के बगल में एक छोटे से कागज़ पर छोटी सी कहानी साझा करना काफी नहीं होता। सामने वाले व्यक्ति पर निर्भर होता है कि उनके साथ कितना साझा किया जा सकता है। एक गामिलराय महिला के तौर पर, हम तब साझा करते हैं, जब कोई सीखने के लिए तैयार होता है," वे कहती हैं।
श्री हार्ट कहते हैं, "आप विचारों में खुलापन रखिये, और सवाल पूछने से हिचकिचाइए मत। और बस ऐसे ही बातों में बात आगे बढ़ती है, और नाते जुड़ जाते हैं!"





