मुख्य बिंदु:
- ऑस्ट्रेलिया डे उस दिन को चिन्हित करता है जब 1788 में अंग्रेज़ों ने सिडनी कोव में यूनियन जैक झंडा फहराया, जो उपनिवेशीकरण की शुरुआत का प्रतीक है।
- 26 जनवरी अंग्रेज़ उपनिवेशीकरण की शुरुआत का प्रतीक है, जो एबोरिजिनल और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर समुदायों के इतिहास का एक दर्दनाक अध्याय है।
- सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि अधिकांश ऑस्ट्रेलियाई चाहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया डे 26 जनवरी को ही मनाया जाए।
26 जनवरी आधिकारिक रूप से ऑस्ट्रेलिया डे है, जो देश का राष्ट्रीय दिवस है। लेकिन देश के इंडिजेनस समुदाय और बढ़ती संख्या में अन्य ऑस्ट्रेलियाई लोगों के लिए यह जश्न का दिन नहीं है।
कमिलरॉय, कूमा और मुर्रवारी समुदाय के कार्यकर्ता और पॉडकास्टर बो स्पीरिम इस दिन के भावनात्मक महत्व को व्यक्त करते हैं।
"मेरे लिए, जब यह दिन आता है, सुबह ऐसा महसूस होता है जैसे मैं किसी अंतिम संस्कार में जा रहा हूं। मुझे पता है कि कुछ बुरा हुआ है। यह एक बहुत ही उदास अहसास है।"
ऑस्ट्रेलिया डे 26 जनवरी को क्यों मनाया जाता है?
26 जनवरी, 1788 को अंग्रेज़ों ने सिडनी कोव में यूनियन जैक झंडा फहराया, जो उपनिवेशीकरण की शुरुआत का प्रतीक था।
ऑस्ट्रेलिया डे को वर्ष 1935 से 26 जनवरी को मनाया जा रहा है, लेकिन यह 1994 में एक राष्ट्रीय सार्वजनिक अवकाश बना।
कुछ ऑस्ट्रेलियाई इस दिन को दोस्तों और परिवार के साथ बारबेक्यू का आयोजन कर, समुद्र तट पर जाकर या आतिशबाज़ी देखकर मनाते हैं। इस तारीख़ को कई नागरिकता समारोह भी आयोजित किए जाते हैं।
लेकिन वर्ष 1938 से ही 26 जनवरी को एबोरिजिनल और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर लोग "शोक दिवस" के रूप में देखते आ रहे हैं। यह विरोध की एक सतत अभिव्यक्ति है। बढ़ती संख्या में ऑस्ट्रेलियाई इस दिन को मनाने से इनकार कर रहे हैं और राष्ट्रीय अवकाश को किसी अन्य तारीख़ पर स्थानांतरित करने की मांग कर रहे हैं।

इंडिजेनस ऑस्ट्रेलियाइयों के लिए 26 जनवरी क्यों दर्दभरा दिन है?
डॉ. समर मे फिनले एक योर्टा योर्टा महिला और यूनिवर्सिटी ऑफ़ वोलोंगोंग में वरिष्ठ व्याख्याता हैं। वे बताती हैं कि 26 जनवरी इंडिजेनस और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर लोगों के लिए कष्टों की शुरुआत का प्रतीक है।
"यह नस्लवाद की शुरुआत है, यह भेदभाव की शुरुआत है, यह उस समय की शुरुआत है जब हमारे लोगों को उस समुदाय और देश से बेदखल कर दिया गया, जिस पर हमारे पूर्वज 65,000 सालों से विचरते आए हैं।"
अंग्रेज़ी उपनिवेशीकरण एबोरिजिनल ऑस्ट्रेलियाइयों के लिए विनाशकारी साबित हुआ, जिन्हें उनकी भूमि से बेदखल किया गया, जनसंहार का सामना करना पड़ा, उनके समुदायों में नई बीमारियां फैलाई गईं, और बच्चों को बलपूर्वक उनके परिवारों से अलग किया गया।
उपनिवेशीकरण के प्रभाव, जैसे व्यवस्थागत भेदभाव, खराब स्वास्थ्य परिणाम, और न्याय प्रणाली में असंतुलित प्रतिनिधित्व, आज भी महसूस किए जाते हैं।
डॉ. फिनले सभी ऑस्ट्रेलियाइयों से आग्रह करती हैं कि वे अपने देश के इतिहास के बारे में जानें।
"मुझे लगता है कि ऑस्ट्रेलिया कई मायनों में एक अद्भुत देश है। मुझे यकीन है कि जो लोग इस देश में आते हैं और नए नागरिक बनते हैं, वे इसे स्वीकार करेंगे और पहचानेंगे। लेकिन साथ ही, हमारे देश का एक ऐसा इतिहास भी है जो महान नहीं है और जिसे विशेष रूप से स्वीकार नहीं किया गया है।"
बदलें, स्वीकारें या तिथि समाप्त करें?
सर्वेक्षणों से पता चलता है कि अधिकांश ऑस्ट्रेलियाई 26 जनवरी को ऑस्ट्रेलिया डे बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन हर साल, बढ़ती संख्या में लोग राष्ट्रीय अवकाश की तिथि बदलने की मांग कर रहे हैं।
कई आदिवासी ऑस्ट्रेलियाई इस तिथि को बदलना चाहते हैं, हालांकि कुछ इसके इतिहास को स्वीकार करने को प्राथमिकता देते हैं। वहीं, बो स्पीरिम जैसे अन्य लोग मानते हैं कि इस दिन को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए।
"यह उपनिवेशवादी सोच को समाप्त करने के बारे में है कि इस देश को शांतिपूर्ण तरीके से तब बसाया गया था या जो आदिवासी लोगों के साथ हुआ, उसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। जबकि इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। और यह 'रेडनेक्स', नस्लवादियों और मुख्यधारा के लोगों को याद दिलाने के लिए है कि आप अब नरसंहार का जश्न नहीं मना सकते, यह सही नहीं है," वे कहते हैं।

26 जनवरी को सम्मानपूर्वक कैसे मनाएं
इंडिजेनस समूह 26 जनवरी को "इन्वेशन डे" या "सर्वाइवल डे" कहते हुए पूरे देश में मार्च, रैलियां, प्रातःकालीन सेवाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
डॉ. फिनले इस दिन की गतिविधियों और इनमें भाग लेने वालों के बारे में बताती हैं।
"मार्च शांतिपूर्ण होते हैं और सड़कों पर विरोध के रूप में निकाले जाते हैं। जब मैं मेलबर्न में रहती थी, तो मैंने कुछ मार्चों में भाग लिया। यह परिवारों के एकसाथ आने का शानदार तरीका है, चाहे वे एबोरिजिनल और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर परिवार हों या गैर-आदिवासी परिवार।"
राणा हुसैन रीकंसिलिएशन ऑस्ट्रेलिया की बोर्ड सदस्य हैं और कहती हैं कि ये आयोजन आशा और एकता का संदेश देते हैं। रीकंसिलिएशन ऑस्ट्रेलिया एक गैर-लाभकारी संस्था है जो आदिवासी और गैर-आदिवासी ऑस्ट्रेलियाइयों के बीच मेल-मिलाप को बढ़ावा देती है।
"आपको एकजुटता का अहसास होता है, और अक्सर समुदाय के साथ होने पर आशा का भी अनुभव होता है। एक सहयोगी के रूप में, मुझे लगता है कि यह बेहद महत्वपूर्ण है कि जब वे इस दिन की तिथि बदलने या इसके सही मायने को स्वीकार करने की मांग करते हैं, तो हम प्रथम राष्ट्र लोगों के साथ खड़े हों।"
कई काउंसिल अब 26 जनवरी को ऑस्ट्रेलिया डे कार्यक्रम और नागरिकता समारोह आयोजित नहीं करती हैं। कुछ कार्यस्थल कर्मचारियों को सार्वजनिक अवकाश किसी अन्य दिन बदलने की अनुमति देते हैं।

प्रवासी समूह आदिवासी ऑस्ट्रेलियाइयों से कैसे जुड़ सकते हैं
बो स्पीयरिम का मानना है कि कई प्रवासी, जिन्होंने युद्ध और आक्रमण का अनुभव किया है, इंडिजेनस संघर्षों को समझ सकते हैं।
"यह अद्भुत है कि लोग यहां आते हैं और शांति पाते हैं। लेकिन 26 जनवरी 1788 से, हमें न्याय नहीं मिला है, हमें शांति नहीं मिली है," वे कहते हैं।
राणा हुसैन का मानना है कि 26 जनवरी का मुद्दा केवल प्रथम राष्ट्र लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी ऑस्ट्रेलियाइयों के लिए महत्व रखता है।
"मुझे लगता है कि बहुत से लोग सोचते हैं कि यह जटिलता, दुख और शोक केवल प्रथम राष्ट्र लोगों तक ही सीमित है, लेकिन जो कोई भी उस दिन के महत्व को समझता है, वह इसे लेकर जटिल भावनाएं ही महसूस कर सकता है। और मेरे लिए, एक भारतीय प्रवासी परिवार की संतान होने के नाते, हमारे पास भी उपनिवेशवाद और अंग्रेज़ी औपनिवेशिक शासन का अपना इतिहास है।"
दूसरी पीढ़ी की प्रवासी होने के नाते, सुश्री हुसैन समझती हैं कि क्यों कई प्रवासी अपने नए पहचान का जश्न मनाना चाहते हैं।
लेकिन उनका मानना है कि इससे पहले कि हम इसे मनाने का एक समावेशी तरीका ढूंढ सकें, सभी ऑस्ट्रेलियाइयों को देश के सही इतिहास के बारे में गंभीर चर्चा करनी होगी।
"मुझे लगता है कि हमें एक देश के रूप में इस बातचीत को करना होगा, और फिर हम यह तय कर सकते हैं कि कौन सा दिन हमारे पूरे इतिहास को मनाने और स्वीकार करने के लिए उपयुक्त होगा, और तब हम एक साथ आ सकते हैं। यह सोचना जरूरी है कि ऐसा कौन सा दिन है जो हम सभी को एकजुट करे।"
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